बिहारी रत्नाकर के महत्वपूर्ण दोहे: मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ। जा तन की झाँई परे, स्याम हरित-दुति होइ॥1।। अपने अंग के जानि कै जोबन-नृपति प्रबीन। स्तन, मन, नैन, नितम्ब की बड़ौ इजाफा कीन।।2।। अर तैं टरत न बर-परे, दई मरक मनु मैन। होड़ाहोडी बढि चले चितु, चतुराई, नैन।।3।। औरें-ओप कनीनिकनु गनी घनी-सिरताज। मनीं धनी के नेह की बनीं छनीं पट लाज।।4।। सनि-कज्जल चख-झख-लगन उपज्यौ सुदिन सनेहु। क्यौं न नृपति ह्वै भोगवै लहि सुदेसु सबु देहु।।5। सालति है नटसाल सी, क्यौं हूँ निकसति नाँहि। मनमथ-नेजा-नोक सी खुभी खुभी जिय माँहि।।6।। जुवति जोन्ह मैं मिलि गई, नैन न होति लखाइ। सौंधे कैं डोरैं लगी अली चली सँग जाइ।।7।। हौं रीझी, लखि रीझिहौ छबिहिं छबीले लाल। सोनजुही सी होवति दुति-मिलत मालती माल।।8।। बहके, सब जिय की कहत, ठौरु कुठौरु लखैं न। छिन औरे, छिन और से, ए छबि छाके नैन।।9।। फिरि फिरि चितु उत हीं रहतु, टुटी लाज की लाव। अंग-अंग-छबि-झौंर मैं भयौ भौंर की नाव।।10।। नीकी दई अनाकानी, फीकी परी गुहारि। तज्यौ मनौ तारन-बिरदु बारक बारनु तारि।।11।। चितई ललचौहैँ चखनु डटि घूँघट-पट माँह। छह सौं चली छुवाइ कै छिनकु...